मुस्लेह-उल-उम्मत हज़रत मौलाना शाह वसीउल्लाह साहब क़ुद्स सिर्रहु

बुजुर्गों के साथ मामला समझ कर करना चाहिए

एक सिलसिला-ए-गुफ्तगू (बातचीत के दौरान) में इरशाद फरमाया कि देवबंद के मदरसे में एक बुजुर्ग थे, उनके साथ कुछ लड़कों ने एक दफा शरारत से एक मज़ाक किया। एक ज़िंदा तालिब-ए-इल्म (छात्र) को कफन पहना कर ताबूत में रख कर जनाजे की सूरत में लाए और उस लड़के को यह सिखला दिया था कि हम लोग तुमको ले जाकर मौलाना के सामने रखेंगे और उनसे नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ाने के लिए कहेंगे; जब वह ‘अल्लाहु अकबर’ कहें तो तुम उठ कर बैठ जाना, बस हम लोग खूब हँसेंगे, एक अच्छा-खासा मज़ाक रहेगा।
चूँकि उस लड़के को जनाजे की सूरत में लाकर उन बुजुर्ग के सामने रखा और कहा कि “हज़रत! जनाज़ा हाज़िर है, नमाज़ पढ़ा दीजिए।” इस पर उन बुजुर्ग ने फरमाया कि “पढ़ा दूँ?” छात्रों ने कहा “जी हाँ, पढ़ा दीजिए।” उन्होंने फिर फरमाया “क्या वाकई पढ़ा ही दूँ?” लड़कों ने कहा “जी हाँ, पढ़ा दीजिए।” कई दफा इकरार करा लेने के बाद मौलाना ने उसकी नमाज़-ए-जनाज़ा शुरू फरमा दी। पहली तकबीर के बाद लड़के इंतज़ार करते रहे कि अब वह तालिब-ए-इल्म कहकहा लगाकर बैठता है, लेकिन वह खामोश पड़ा रहा। मौलाना ने चार तकबीरों के बाद सलाम फेरकर छात्रों से मुखातिब होकर फरमाया कि “नमाज़ खत्म हो गई, अब इसे ले जाकर दफन कर दो।”

छात्रों ने जो आकर देखा तो उसकी रूह परवाज़ कर चुकी थी (वह मर चुका था)। आखिरकार उसको ले जाकर दफन कर दिया और कफ-ए-अफ़सोस मल कर रह गए (पछताते रह गए)। हज़रत वाला ने इस वाकये को नक़ल फरमाकर इरशाद फरमाया कि बुजुर्गों के साथ मज़ाक करने का यही नतीजा हुआ करता है। वाकई इन हज़रात से बहुत सँभल कर मामला करना चाहिए। ये हज़रात मुकर्रबान-ए-बारगाह-ए-खुदावंदी (ईश्वर के करीबी) होते हैं, इनकी अज़ीयत (तकलीफ) से अल्लाह तआला को बहुत नागोवारी और सख्त गुस्सा होता है।

चूँकि हदीस-ए-कुदसी में वारिद है, हक तआला खुद इरशाद फरमाते हैं:

مَنْ عَادٰى لي وَلِيّاً فَقَدْ آذَنْتُهُ بِالحَرْبِ

(अर्थ: जो शख्स मेरे किसी वली से दुश्मनी करेगा और उसको सताएगा, तो मैं उसके साथ जंग का ऐलान करता हूँ।)

देखिये! इस हदीस से मालूम होता है कि अहल-ए-अल्लाह (ईश्वर के प्रिय लोग) को ईज़ा पहुँचाना और उनको सताना किस कदर खतरनाक चीज़ है कि इस पर अल्लाह तआला ऐलान-ए-जंग फरमा रहे हैं और अल्टीमेटम दे रहे हैं कि “मुझसे जंग के लिए तैयार हो जाए।” अआज़नाल्लाहु मिन्हा (अल्लाह हमें इससे बचाए)।

इसी सिलसिले में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का एक वाकया हज़रत वाला ने ज़िक्र फरमाया कि जब कारून से मूसा अलैहिस्सलाम ने फरमाया कि अपने माल की ज़कात अदा करो, तो वह बहुत घबराया कि यह तो बहुत बड़ी रक़म है, इतनी कसीर मिकदार (बड़ी मात्रा) माल की निकालनी पड़ेगी। इसलिए सोचा कि लाओ ऐसी कोई तरकीब करूँ कि मूसा अलैहिस्सलाम लोगों के दरमियान बदनाम हो जाएँ। चूँकि उसने एक औरत को खूब रुपया-पैसा देकर आमादा (तैयार) किया कि जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम मजमे में वाज़ (उपदेश) फरमाएँ तो तुम कहना कि इन्होंने मेरे साथ बुरा फेल (कृत्य) किया है।

चूँकि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम जब अपनी कौम को खिताब फरमा रहे थे, उस वक्त वह औरत खड़ी हुई और उसने वह बात मजमे में कही। इस पर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उस औरत को डाँट कर पूछा कि “सच-सच बता तुझे यह बात किसने सिखाई है?” वह हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की डाँट सुनते ही लर्ज़ गई और काँपने लगी। फिर उसी मजमे में उसने इकरार किया कि यह सब हरकत कारून की है, उसने मुझे सिखा-पढ़ा कर भरे मजमे में आप पर इल्ज़ाम लगाने के लिए लालच देकर आमादा किया था।

हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम बारगाह-ए-खुदावंदी में सर-ब-सजूद हुए (सजदे में गिर गए) और फरियाद-ओ-ज़ारी करने लगे। इस पर अल्लाह तआला ने फरमाया कि “ऐ मूसा! ज़मीन कुल की कुल तुम्हारे कब्ज़ा-ए-कुदरत में मैंने दे दी है, तुम ज़मीन को जो हुक्म दोगे वह उस पर अमल करेगी।” चूँकि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने ज़मीन को हुक्म दिया कि कारून को निगल ले।

चुनाँचे उसी वक्त ज़मीन ने उसको निगलना शुरू कर दिया। जब कारून ज़मीन में धँसने लगा तो मूसा अलैहिस्सलाम से कहा कि “आप मुझको ज़मीन में इसलिए धँसा रहे हैं कि मेरे खज़ाने पर कब्ज़ा कर लें।” हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने ज़मीन को हुक्म दिया कि इसको मय (समेत) इसके खज़ाने के निगल ले। चूँकि ज़मीन ने कारून को मय उसके खज़ाने के निगल लिया और वह ज़मीन में धँसता चला जा रहा है।

बाक़ी आईन्दा…

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