मजलिस
मुस्लेह-उल-उम्मत हज़रत मौलाना शाह वसीउल्लाह साहब क़ुद्स सिर्रहु
एक दिन सुबह की मजलिस में बैठने के साथ ही कुरान करीम की आयत— إِنَّ قَارُوْنَ كَانَ مِنْ قَوْمِ مُوسىٰ فَبَغىٰ عَلَيْهِمْ (बेशक कारून मूसा की कौम में से था, फिर वह उन पर सरकशी करने लगा) —की आखिर तक तिलावत करके यूँ बयान फरमाया:
अल्लाह तआला ने कुरान हकीम में पिछली उम्मतों के जो हालात बयान फरमाए हैं, तो वह इसलिए नहीं कि वह महज़ एक किस्सा था जिसे हम पढ़ें और गुज़र जाएँ। बल्कि एक-एक वाकया अपने अंदर बहुत सी इब्रत (सबक) और नसीहतें रखता है। इन्हीं वाकयात में से कारून का किस्सा भी है।
अल्लाह तआला ने जिस तफ़्सील (विस्तार) और असरदार अंदाज़ से उसके हालात का नक्शा खींचा है, वह कुरान ही का हिस्सा है। मुमकिन नहीं कि इंसान सच्चे दिल से इन आयात की तिलावत करे और दुनिया की मोहब्बत उसके दिल से न निकल जाए। यह बड़ी ही इब्रत का वाकया है। इसमें एक ‘दुनियादार’ का पूरा इतिहास है—उसके माल-ओ-दौलत पर घमंड करने का और उस पर ईश्वरीय प्रकोप (वबाल) के उतरने का। अल्लाह तआला ने इसे बयान फरमाकर उम्मत-ए-मुहम्मदिया ﷺ के दिल से दुनिया की मोहब्बत को गोया कि खुरच-खुरच कर निकाल दिया है, बशर्ते कि कोई इब्रत हासिल करने का इरादा करे, सोचे और समझे।
चुनाँचे फरमाते हैं कि:
إِنَّ قَارُونَ كَانَ مِن قَوْمِ مُوسَىٰ فَبَغَىٰ عَلَيْهِمْ
(अर्थ: कारून मूसा अलैहिस्सलाम ही की कौम का एक शख्स था, यानी बनी इसराइल में से था, वह फिरौनियों में से न था।) मगर बनी इसराइल में से होने के बावजूद उसने उन पर ‘बग़ी’ (सरकशी) का रास्ता अपनाया। ‘रूह-उल-मआनी’ में लिखा है कि उसने उन पर अपनी श्रेष्ठता चाही और यह ख्वाहिश की कि वह सबसे अफ़ज़ल (बड़ा) होकर रहे और सबका हाकिम बन जाए, और सारी कौम उसके हुक्म के नीचे आ जाए। या इसका मतलब यह है कि वह अपनी ही कौम पर तकब्बुर (घमंड) करने लगा।
मतकब्बिर (घमंडी) का अंजाम
मैं कहता हूँ कि दोनों का सार एक ही है। इंसान दूसरों पर जो बड़ाई चाहता है, उसका मूल कारण भी ‘तकब्बुर’ ही होता है। उसके तकब्बुर की निशानियों में यह भी गिना गया है कि उसने अपना कपड़ा (तहबंद) एक बालिश्त नीचे लटका रखा था (जो उस समय अहंकार का प्रतीक था)। उसकी यह सरकशी और घमंड उस वक्त बढ़ा जब फिरौन ने उसे बनी इसराइल पर हाकिम मुकर्रर कर दिया था।
आगे अल्लाह तआला उसकी सरकशी की वजह बयान करते हुए इरशाद फरमाते हैं:
وَآتَيْنَاهُ مِنَ الْكُنُوْزِ مَا إِنَّ مَفَاتِحَهٗ لَتَنُوْءُ بِالْعُصْبَةِ أُوْلِي الْقُوَّةِ
(अर्थ: और हमने उसको इस कदर खजाने दिए थे कि उनकी कुंजियाँ (चाबियाँ) कई-कई ताकतवर इंसानों को बोझिल कर देती थीं, यानी उनसे बड़ी मुश्किल से उठती थीं।)
जब चाबियों की यह तादाद थी, तो खज़ानों का क्या पूछना!
إِذْ قَالَ لَهُ قَوْمُهُ لَا تَفْرَحْ إِنَّ اللهَ لَا يُحِبُّ الْفَرِحِيْنَ
(अर्थ: जब उसकी कौम ने खैरख्वाही के तौर पर उससे कहा कि—तू इस माल-ओ-दौलत पर इतरा मत। बेशक अल्लाह तआला इतराने वालों को पसंद नहीं फरमाता।)
और यह भी कहा कि:
وَٱبْتَغِ فِيمَآ ءَاتَىٰكَ ٱللَّهُ ٱلدَّارَ ٱلْـَٔاخِرَةَ ۖ وَلَا تنسَ نَصِيبَكَ مِنَ ٱلدُّنْيَا ۖ وَأَحْسِن كَمَآ أَحْسَنَ ٱللَّهُ إِلَيْكَ ۖ وَلَا تَبْغِ ٱلْفَسَادَ فِى ٱلْأَرْضِ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلْمُفْسِدِينَ
(अर्थ: तुझे खुदा ने जितना दे रखा है, उसमें आख़िरत (परलोक) की भी खोज किया कर और दुनिया से अपना हिस्सा आख़िरत में ले जाना मत भूल। यानी जैसे खुदा ने तेरे साथ एहसान किया है, वैसे ही तू भी खुदा के बंदों के साथ एहसान कर और खुदा की नाफरमानी व हुकूक (अधिकार) ज़ाया करके ज़मीन पर फसाद मत फैला। बेशक अल्लाह फसाद करने वालों को पसंद नहीं करता।)
‘ला-तफ़्रह’ (मत इतरा) की व्याख्या करते हुए ‘रूह-उल-मआनी’ के लेखक लिखते हैं कि: दुनिया की चीज़ों पर ऐसा घमंडी हर्ष (खुशी) करना निंदनीय है, क्योंकि यह दुनिया की मोहब्बत का नतीजा है। ऐसी खुशी तभी होती है जब इंसान के ज़हन से उस चीज़ के खत्म होने का ख्याल निकल जाए। ज़ाहिर है कि यह गफ़लत (लापरवाही) का आख़िरी दर्जा है। क्योंकि अगर आदमी को यह याद रहे कि यह लज़्ज़त और राहत एक न एक दिन खत्म हो जाएगी, तो उसे खुशी के बजाय ‘तरह’ (ग़म) होगा।
नापायदार (अस्थायी) राहत से खत्म हो जाने वाली मुसीबत बेहतर है
जैसा कि मुतवन्नी ने कहा है:
اشد الغم عندي في سرور — تیقن عنه صاحبه انتقالا
(अर्थ: मेरे नज़दीक सबसे बड़ा ग़म उस खुशी में है, जिसके मालिक को यह यकीन हो कि यह एक दिन खत्म हो जाएगी।)
एक और शायर कहता है:
و اذا نظرت فان بؤسا زائلا — للمر أخير من نعيم زائل
(अर्थ: मैं जब गौर से देखता हूँ तो यह समझ आता है कि इंसान के हक़ में वह मुसीबत जो खत्म हो जाने वाली हो, उस राहत से कहीं बेहतर है जो गुज़र जाने वाली हो।)